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Tuesday, 24 January 2017

हताश हैं अजित सिंह, लगानी पड़ी टिकटों की सेल

अकेले खड़े हैं अजित सिंह; भाजपा, सपा व कांग्रेस के लिए वोट कटवा बन रहे हैं 

चौधरी अजित सिंह की इस बार क्या लोकसभा चुनाव की तरह दुर्गति होने जा रही है? हालात तो कुछ ऐसे ही बन रहे हैं। शायद यही कारण है कि अजित सिंह ने टिकटों की सेल लगाई और मनमाना दाम लगाए टिकटों के। पिछले चुनाव में वे कांग्रेस के साथ थे तो उससे पहले भाजपा के साथ मिलकर उन्होंने चुनाव लड़ा था। अगर इस चुनाव में अजित सिंह की स्थिति को एक पंक्ति में व्यक्त करना हो तो कहा जा सकता है- छोटे चौधरी बाहुबलियों की टीम लेकर वोट काटने की राजनीति करते नजर आ रहे हैं। दूसरे शब्दों में यह भी कहा जा सकता है कि जिन जाट मतों के दम पर चौधरी अजित सिंह कांग्रेस व भाजपा से सौदेबाजी करते रहे हैं वे जाट मत ही अब उनके अछूत हो जाने का सबब बन गए हैं।

2013 में हुए मुजफ्फरनगर के दंगे ने राजनीतिक रूप से सबसे ज्यादा नुकसान छोटे चौधरी का ही किया। 2014 के लोकसभा चुनाव में अजित सिंह को एक भी सीट नहीं मिली। जबकि 2009 में उनके पांच सांसद थे। खुद अजित सिंह बागपत (सत्यपाल सिंह से) से और उनके सुपुत्र जयंत चौधरी (हेमा मालिनी से) मथुरा से बुरी तरह हार गए। देखा जाए तो मुजफ्फरनगर का दंगा एक तरह से मुसलमानों व जाटों के बीच का संघर्ष था। यही वजह रही कि आम चुनाव में जब मोदी लहर चली तो सभी जाट एकतरफा भाजपा के समर्थन खड़े नजर आए। भाजपा के प्रत्याशी जाट बहुल सीटों मुजफ्फरनगर, कैराना, मेरठ, बागपत, मथुरा आदि पर लाखों वोटों के अंतर से जीते। कहा जा सकता है कि मुजफ्फरनगर दंगे ने वेस्ट यूपी की राजनीति को नए सूत्रों में पिरोने का काम किया।

जाट मतों के सौदागर के रूप में मशहूर रालोद प्रमुख अजित सिंह ने यूपीए सरकार में केंद्रीय मंत्री का लुत्फ उठाया लेकिन जैसे ही यूपी के चुनाव आए तो भाजपा से गठबंधन की बात शुरू कर दी। अमित शाह एंड पार्टी ने उन्हें किसी भी तरह का आश्वासन देने से इनकार कर दिया। कहा तो यहां तक जा रहा है कि उन्होंने अजित सिंह को अपनी पार्टी राष्ट्रीय लोकदल को भाजपा में विलय कर लेने की आफर दी। सुना जाता है कि अजित सिंह ने मन भी बना लिया था लेकिन उन्होंने अपने बेटे जयंत चौधरी को यूपी का डिप्टी सीएम प्रत्याशी बनाए जाने की मांग कर डाली और उनकी कोई भी शर्त भाजपा को मंजूर नहीं थी। इसके अलावा भाजपा के तमाम नेताओं का मानना था कि अजित सिंह मौकापरस्त राजनीति करते हैं और वह पहले भी भाजपा को धोखा दे चुके हैं।

भाजपा से निराश होने के बाद अजित सिंह ने समाजवादी पार्टी से बात शुरू की। सपा से भी उन्हें कुछ ऐसे ही सुर सुनने के लिए मिले। अखिलेश ने रालोद को सपा में मर्ज कर लेने की आफर दी और जयंत को डिप्टी सीएम बनाए जाने से साफ मना कर दिया। इसके बाद अजित सिंह ने फिर कांग्रेस से बात शुरू की। सपा ने कांग्रेस के साथ मिलकर गठबंधन का ऐलान कर दिया तो अजित सिंह ने इस गठबंधन में भी घुसने का प्रयास किया। अखिलेश ने अजित सिंह को जरा भाव नहीं दिया बल्कि कांग्रेस को साफ कह दिया कि उन्हें जो 105 सीटें गठबंधन में से दी जा रही हैं उन पर वह चाहे तो किसी को भी टिकट दे दें। यानी यहां भी अजित सिंह की दाल नहीं गली। वैसे हकीकत यह है कि सपा व कांग्रेस ने अजित को गठबंधन में इसलिए नहीं शामिल नहीं किया क्योंकि उन्हें मुस्लिम मतों के छिटक जाने का भी खतरा था।

तमाम तरह के प्रयास विफल हो जाने के बाद अजित सिंह ने अकेले ही मैदान में उतरने का फैसला किया है। रालोद के पास प्रत्याशियों का भयंकर अकाल था ऐसे में अजित सिंह के सामने 'टिकटों की सेलÓ लगाने के अलावा कोई चारा नहीं था। अजित ने पिछले तीन दिनों में टिकटों की घोषणाएं की तो जो नाम सामने आए वे बहुत ही चौंकाने वाले थे। इनमें से कई तो ऐसे हैं जिन पर छोटे-मोटे नहीं बड़े-बड़े दाग लगे हैं। लोनी से चुनाव लड़ रहे पूर्व विधायक मदन भैया के रिकार्ड को कौन नहीं जानता? बुलंदशहर से गुड्डू पंडित, मुजफ्फरनगर की खतौली सीट से शाहनवाज राणा की भी तारीफ लंबी चौड़ी है। पहले शाहनवाज राणा मीरापुर (मुजफ्फरनगर) से सपा का टिकट ले आए थे। फिर गठबंधन की बात चली तो कांग्रेस में शामिल हो गए और जब कांग्रेस को मीरापुर सीट नहीं मिली तो थक हारकर अजित सिंह से टिकट ले लिया। शाहनवाज राणा को 2012 में भी इसी तरह से अजित सिंह के साथ सौदेबाजी करनी पड़ी थी। उस समय शाहनवाज बिजनौर से बसपा के विधायक थे। उन्हीं दिनों हाईवे पर दिल्ली की दो युवतियों से गैंगरेप की घटना में राणा परिवार के कुछ युवकों का नाम आया तो मायावती ने शाहनवाज का टिकट काट दिया था। इसके बाद शाहनवाज रालोद के टिकट पर लड़े थे लेकिन भाजपा प्रत्याशी से हार का सामना करना पड़ा था।

एक और सौदेबाजी अजित सिंह ने शामली सीट से करने का प्रयास किया लेकिन दाल नहीं गल सकी। वहां से कांग्रेस के सिटिंग विधायक पंकज मलिक को जब लगा कि कांग्रेस से सपा की बात नहीं बन पा रही है तो उनके पिता हरेंद्र मलिक ने अजित सिंह से बात कर ली लेकिन गठबंधन फाइनल हो जाने के कारण कांग्रेस को शामली सीट मिल गई और पंकज मलिक ने रालोद में जाने का इरादा त्याग दिया। कुल मिलाकर अजित सिंह ने जो भी प्रत्याशी मैदान में उतारे हैं उनका इरादा जीतने का कम बल्कि दूसरे दलों के जीत रहे प्रत्याशियों के वोट काटने का ज्यादा नजर आ रहा है। सबसे बड़ा सवाल तो यह होगा कि क्या रालोद विधानसभा चुनाव में खाता खोल पाएगी? या लोकसभा चुनाव का इतिहास दोहराया जाएगा।