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Monday, 28 May 2018

Exit Poll- Kairana : कैराना उपचुनाव- कौन जीतेगा जानिए

भाजपा प्रत्याशी मृगांका सिंह

रालोद प्रत्याशी तबस्सुम बेगम 
कैराना फाइनल अपडेटः

कुल 54 प्रतिशत मतदान हुआ

चुनाव आयोग को 20 प्रतिशत वीवीपेट मशीनें बदलनी पड़ी


रालोद ने की शिकायत, चुनाव आयोग ने दिया आश्वासन

जयंत चौधरी ने कहा- 170 ईवीएम खराब हुई

एग्जिट पोल अनुमानः 
- लगभग 8.50 से 9 लाख वोट पड़े
- भाजपा को 5 लाख से अधिक वोट मिलने का अनुमान
- रालोद प्रत्याशी को 4.5 लाख के आसपास वोट मिलने का आकलन 







- कांटे की टक्कर में भाजपा को जीत मिलने के आसार। 
- भाजपा का 30-40 हजार वोट से जीतने की संभावना 





Friday, 25 May 2018

योगी की रैली के बाद दलित वोटर के रुख में बदलाव ?


लखनऊः कैराना लोकसभा उपचुनाव में ध्रुवीकरण की हवा चलने लगी है। योगी आदित्यनाथ की वीरवार को शामली में हुई जनसभा ने सारा माहौल बदल दिया है। यहां रालोद की प्रत्याशी तबस्सुम बेगम को सपा, बसपा, कांग्रेस आदि ने समर्थन दिया है और भाजपा की प्रत्याशी मृगांका सिंह कठिन चुनौती का सामना कर रही हैं। वे अपने पिता स्व हुकुम सिंह के निधन से खाली हुई सीट को फिर से हासिल करने के लिए चुनाव लड़ रही हैं। मुस्लिम, दलित बहुल इस सीट पर भाजपा गैर मुुस्लिम वोटों को एकजुट करने की कोशिश कर रही है। ऐसे में भाजपा के पास ध्रुवीकरण के अलावा कोई चारा नहीं है।
माना जा रहा है कि योगी की रैली में जिस तरह से गन्ना व जिन्ना का जिक्र किया है उससे यह संदेश जा रहा है कि मुस्लिम प्रत्याशी के खिलाफ हिंदू मत भाजपा की ओर मुड़ेंगे। संदेश दिया जा रहा है कि अभी तक खामोश दलित मतदाता 28 मई को भाजपा के लिए ही वोटिंग करेगा। पेश है वेस्ट यूपी के अखबारों में छपी खबरों की एक झलक जिनसे साफ है कि योगी की रैली ने कैराना सीट पर क्या प्रभाव छोड़ा है-


 











Thursday, 24 May 2018

कैराना उपचुनाव: भाजपा के नेताओं का क्षेत्र में ही डेरा

सेक्टरों में ही दिन रात काम कर रहे हैं भगवा ब्रिगेड के पदाधिकारी, संयुक्त विपक्ष ने भी कमर कसी

शामलीः उत्तर प्रदेश में फूलपुर व गोरखपुर उपचुनाव के नतीजों से सहमी भाजपा ने कैराना लोकसभा सीट के उपचुनाव के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। वीरवार को सीएम योगी आदित्यनाथ ने शामली क्षेत्र में दो रैलियों को संबोधित किया। इससे पहले वे दो रैलियां सहारनपुर जिले में पडऩे वाली कैराना लोकसभा सीट की दो विधानसभाओं गंगोह व नकुड़ में भी कर चुके हैं। भाजपा वह गलती नहीं दोहराना चाहती जो गोरखपुर व फूलपुर में उससे हुई थी।

भाजपा ने अपनी पूरी संगठनात्मक ताकत कैराना लोकसभा सीट पर केंद्रित कर दी है। लगभग एक दर्जन विधायक आसपास के जिलों से यहां बुला लिए गए हैं और प्रचार में लगाए गए हैं। जो भी सैक्टर प्रभारी बनाए गए हैं उन्हें रात दिन क्षेत्र में रहने के लिए कहा गया है। मुजफ्फरनगर के वरिष्ठ भाजपा नेता राजीव गर्ग, जिन्हें कैराना लोकसभा का संयोजक बनाया गया है, बताते हैं कि पार्टी अपनी ओर से कोई कसर नहीं छोड़ रही है। सभी सेक्टर प्रभारियों को 28 मई (मतदान दिवस) तक अपने ही क्षेत्रों में रुकने के लिए कहा गया है। सबकी ठहरने की व्यवस्था कर दी गई है और उन्हें बार-बार मतदाताओं से संपर्क करने के लिए कहा जा रहा है। भाजपा ने यहां से स्व. हुकुम सिंह (जिनके निधन के बाद यहां उपचुनाव हो रहा है) की बेटी मृगांका सिंह को प्रत्याशी बनाया है।
हसन परिवार में एकता कराते जयंत चौधरी। कंवर हसन ने दिया तबस्सुम को समर्थन. 

सपा नेता संयुक्त प्रत्याशी का प्रचार करते हुए । 

कैराना क्षेत्र में घर-घर बैठक करते भाजपा नेता। 
कैराना सीट पर पहली बार विपक्ष ने सही मायने में एकता दिखाई है। विपक्ष की संयुक्त प्रत्याशी तबस्सुम बेगम को, जो कैराना सीट से 2009 में बसपा की सांसद रह चुकी हैं, अजित सिंह की रालोद के बैनर पर उतारा गया है। उन्हें सपा, बसपा और कांग्रेस की भी सपोर्ट मिल रही है। रालोद का वेस्ट यूपी में अच्छा प्रभाव है और इसलिए रालोद के पूर्व सांसद जयंत चौधरी लगातार क्षेत्र में ही रहकर सक्रिय प्रचार की कमान संभाले हुए हैं। सपा ने भी अपने कई नेताओं को भेजा है। इनमें प्रदेश अध्यक्ष नरेश उत्तम प्रमुख हैं। कांग्रेस की ओर से पूर्व विधायक पंकज मलिक व पूर्व सांसद हरेंद्र सिंह मलिक जाटों को लुभा रहे हैं। बसपा ने भी तबस्सुम के समर्थन में अपील की है। वहीं भाजपा ने जाटों को साधने के लिए मुजफ्फरनगर के जाट सांसद संजीव बालियान को लगाया है। उन्हें ताकीद किया गया है कि वे केवल जाटों के गांवों में ही संपर्क करें। उन्हें रैलियां नहीं बल्कि डोर टू डोर कैंपेन के लिए कहा गया है। इसी प्रकार जातीय समीकरणों को देखते हुए सभी को इसी प्रकार दायित्व सौंपे जा रहे हैं। ठाकुर बहुल इलाकों में यूपी के फायरब्रांड नेता व गन्ना मंत्री सुरेश राणा को लगाया गया है। पार्टी प्रभारियों की रिपोर्ट के आधार पर यह भी आकलन करेगी कि किस क्षेत्र में भाजपा को कितने वोट मिले।

हिंदू मुस्लिम समीकरण पर टिकी भाजपा 
संयुक्त प्रत्याशी तबस्सुम बेगम के खिलाफ उनके देवर कंवर हसन ने लोकदल (सुनील) के बैनर पर परचा भर दिया था। भाजपा को उम्मीद थी कि वे अपनी भाभी के मुस्लिम वोट काटेंगे लेकिन उन्होंने भी बेगम को समर्थन देने का ऐलान कर दिया है। ऐसे में भाजपा के सामने केवल हिंदू-मुस्लिम कार्ड ही चारा बचता है। यहां 5 लाख से भी ज्यादा मुस्लिम वोट हैं। जो चुनाव का पासा पलट सकते हैं। दलित वोटर खामोश हैं और भाजपा को यह खामोशी सता रही है। मायावती उपचुनाव लड़ती नहीं हैं और इसलिए प्रचार भी नहीं करती हैं लेकिन अखिलेश यादव का भी बेगम के प्रचार में ना आना कुछ लोगों को खल रहा है। इसके पीछे तर्क दिया जा रहा है कि अगर अखिलेश ने सभा की तो उसमें सबसे ज्यादा मुस्लिम वोटर ही उमड़ेंगे। ऐसे में भाजपा को मतों का ध्रुवीकरण करने का मौका मिल जाएगा। और अखिलेश यह मौका नहीं देना चाहते हैं। विपक्ष का मानना है कि आंकड़े उसके समर्थन में हैं और सारी मेहनत भाजपा को करनी है।

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वोट प्रतिशत बढ़ाने पर जोर 
भाजपा को यह सीट निकालने के लिए वोट प्रतिशत पर ध्यान देना होगा। अगर 50-55 प्रतिशत से आगे मतदान जाता है तो ही भाजपा को फायदा हो सकता है नहीं तो नतीजा फूलपुर व गोरखपुर जैसा ही होगा। 2014 के चुनाव में स्व. हुकुम सिंह को जितने वोट मिले थे उतने उनके तीनों प्रमुख विपक्षी उम्मीदवारों को मिलाकर भी नहीं मिले थे और वे भारी अंतर से जीते थे। पर उपचुनाव में मतदाता उत्साहित नहीं होता और इससे भाजपा की दिक्कतें बढ़ जाती हैं।


जातिगत आंकड़े :
मुस्लिम 5.2 लाख
दलित 2.8 लाख
जाट 1.3 लाख
गुर्जुर 1.24 लाख
सैनी 1.15 लाख
ठाकुर 60 हजार
ब्राह्मण 65 हजार
वैश्य 65 हजार
अन्य 2 लाख

Saturday, 12 May 2018

Kairana ByPoll 2018 : घर का भेदी लंका ढाए, तबस्सुम परेशानी में

शामलीः कैराना लोकसभा के उपचुनाव में एक बार फिर हसन परिवार की घरेलू लड़ाई खुलकर सामने आ गई है। विपक्ष की इकलौती उम्मीदवार पूर्व सांसद तबस्सुम बेगम को परेशान करने के लिए उनके देवर कंवर हसन ने लोकदल (सुनील सिंह वाली) प्रत्याशी के रूप में दावा ठोक दिया है।

कंवर हसन के अलावा मुनव्वर के दूसरे भाई अनवर हसन (2012 में) और अरशद हसन (2007 में) भी विधानसभा चुनाव लड़ चुके हैं लेकिन उन्हें हार का सामना करना पड़ा। अब कंवर हसन आ गए हैं। कंवर हसन अब तक हसन परिवार का स्टील फैक्ट्री का कारोबार ही संभालते रहे हैं। पूर्व सांसद मुनव्वर हसन जब तक जिंदा थे तब तक पूरा हसन परिवार उनके कहे अनुसार चलता था लेकिन उनकी 2008 में असामयिक हादसे में मौत के बाद सारा परिवार बिखर गया। बाद में मुनव्वर हसन के पिता पूर्व सांसद अख्तर हसन भी वृद्धावस्था के चलते चल बसे। इस तरह हसन परिवार को जोड़कर रखने वाला कोई नहीं रहा। मायावती ने मुनव्वर की बेवा तबस्सुम को 2009 में लोकसभा का टिकट दे दिया और वे दिग्गज भाजपा नेता स्व. हुकुम सिंह (जो पहली बार लोकसभा चुनाव लडे थे) को हराकर सांसद बन गई। इसी के बाद से हसन परिवार में दो धड़े हो गए। मुनव्वर की पत्नी व बेटा नाहिद एक तरफ और उनके दूसरे भाई एक तरफ।
मृगांका पर बाबू हुकुम सिंह की विरासत बचाने का दबाव है। 
तबस्सुम ने पांच साल तक सांसद रहने के बाद अपनी राजनीतिक विरासत बेटे नाहिद हसन को सौंपने का फैसला किया। नाहिद उस समय आस्ट्रेलिया में पढ़ रहे थे और बहुत छोटे थे। नाहिद वापस लौटे और उन्होंने मां की बात मानकर कैराना सीट से ही सपा के टिकट पर 2014 का लोकसभा चुनाव लडा। मोदी लहर में हुकुम सिंह ने बड़ी जीत हासिल की। उन्हें 565909 वोट मिले और नाहिद को 329081 वोट मिले। नाहिद को जीत नहीं मिली लेकिन राजनीति की एबीसी सीख गए।

हुकुम सिंह के सांसद बन जाने के बाद कैराना विधानसभा सीट का अक्टूबर 2014 में उपचुनाव हुआ और इसमें नाहिद हसन हुकुम सिंह के भतीजे अनिल चौहान को हराकर विधायक बन गए। इससे मुनव्वर हसन के दूसरे भाइयों में बेचैनी बढ़ी और उन्होंने राजनीति में सक्रियता बढ़ाने का फैसला किया। परिवारों में आपसी झगड़े होते ही रहते हैं और इस परिवार में भी थे। इससे पहले 2012 में मुनव्वर के एक और भाई अनवर हसन (60750) ने भी बसपा के टिकट पर विधानसभा चुनाव लड़ा था और हुकुम सिंह (80293) से लगभग 20 हजार मतों से हारे थे। नाहिद उस समय विदेश में थे। मुनव्वर के भाइयों को लगा कि वे राजनीति में आगे आ सकते हैं। शायद यही वजह है कि अब कंवर हसन भी राजनीति में आए हैं।

कैराना लोकसभा उपचुनाव 2018 में भाजपा की प्रत्याशी स्व. हुकुम सिंह की बेटी मृगांका सिंह की जीत मुश्किल लग रही है। सारा विपक्ष एक हो गया है और पूर्व बसपा सांसद तबस्सुम को सपा, रालोद व कांग्रेस आदि का समर्थन मिल रहा है। ऐसे में उनकी जीत साफ नजर आ रही थी लेकिन एक और मुस्लिम प्रत्याशी मैदान में आता है तो खेल बिगड़ सकता है। लगभग 5 लाख मुस्लिम वोटरों वाले इस लोकसभा क्षेत्र में दो मुस्लिम प्रत्याशी तो होते ही थे। इससे भाजपा को भी राहत मिलेगी। सुनील सिंह की लोकदल की इस क्षेत्र में ज्यादा पहचान नहीं है लेकिन फिर भी ‘मनीगेम’ में वह हलचल कर सकते हैं। सुनील सिंह राजनीतिक परिवार से आते हैं और लखनऊ में उनके कई बड़े शैक्षणिक संस्थान हैं। कहा तो यह भी जा रहा है कि भाजपा ने कंवर हसन को अंदरूनी तौर पर सपोर्ट करने का फैसला किया है लेकिन ये सब राजनीति की बाते हैं।


 पिछले विधानसभा चुनाव में जब नाहिद हसन (98830) ने मृगांका (77668) को हराया था तो हुकुम सिंह के भतीजे अनिल (19992) ने रालोद के टिकट पर लड़कर ‘घर का भेदी लंका ढाए’ की भूमिका निभाई थी। अब यही काम कंवर हसन कर सकते हैं। वे जितने भी वोट काटेंगे सभी तबस्सुम के खाते से जाएंगे। देखते हैं 28 मई को चुनाव है और 31 को नतीजा आएगा। तब सब साफ हो जाएगा।

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