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Thursday, 31 May 2018

कैराना उपचुनावः भाजपा की हार के जिम्मेदार ये 3 नेता

नई दिल्ली/शामलीः कैराना लोकसभा सीट पर भाजपा की करारी हार के साथ ही पार्टी में यह मंथन शुरू हो गया है कि इस हार का कारण क्या रहा ? भाजपा कार्यकर्ताओं में रोष तो है ही साथ ही अपने लोकल बड़े नेताओं के प्रति नाराजगी भी है। भाजपा कार्यकर्ताओं का कहना है कि मुजफ्फरनगर के भाजपा सांसद डॉ. संजीव बालियान, यूपी के गन्ना मंत्री सुरेश राणा (जो थानाभवन से विधायक हैं और थानाभवन विधानसभा सीट कैराना लोकसभा सीट का ही हिस्सा है) और सहारनपुर के वरिष्ठ भाजपा नेता व यूपी सरकार में आयुष मंत्री धर्म सिंह सैनी का इस हार में बड़ा योगदान है। सैनी नकुड़ विधानसभा सीट से विधायक हैं और यह भी कैराना का ही हिस्सा है। वे लगातार तीसरी बार विधायक हैं। बसपा सरकार में भी वे मंत्री थे और उन्होंने 2017 के चुनाव के समय ही भाजपा ज्वाइन की थी। इन तीनों नेताओं पर ही पार्टी ने सबसे ज्यादा भरोसा किया हुआ था और ये भाजपा को अपने बल पर वोट दिलाने में विफल रहे।

कैराना का परिणामः
तबस्सुम बेगम (रालोद) 421145 मत

मृगांका सिंह (भाजपा) 371691 मत

अंतर- 49545

संजीव बालियान- पहले से ही निशाने पर हैं भाजपा के शीर्ष नेतृत्व के, पढिए यह स्टोरी

फिलहाल पार्टी में मंथन का दौर शुरू हो गया है। पहला विचार यही सामने आ रहा है कि न तो संजीव बालियान जाटों के वोट दिलवा सके और न ही दूसरे वर्गों की। थानाभवन में भी भाजपा को सबसे कम वोट मिले और यही हाल नकुड़ में रहा। एक भाजपा नेता ने बताया कि प्रचार के दौरान ही साफ हो गया था कि इन तीनों नेताओं का ही अपने इलाकों पर कोई नियंत्रण नहीं है। 

संजीव ने पार्टी को भरोसा दिलाया था कि वे जाटों को फिर से अजित सिंह की ओर नहीं लौटने देंगे। इसी प्रकार राणा व सैनी ने थानाभवन व नकुड़ विधानसभा क्षेत्रों की गारंटी ली थी लेकिन सब फेल रहे। थानाभवन में तो सुरेश राणा ने किसी बड़े नेता या सीएम योगी की रैली भी नहीं होने दी। राणा ने पार्टी हाईकमान को भरोसा दिलाया था कि वे अपने इलाके से भारी समर्थन भाजपा प्रत्याशी मृगांका सिंह को दिलवाएंगे। पर ऐसा नहीं हुआ। सबसे कम वोट भाजपा को थानाभवन से ही मिले हैं। अभी आंकड़े एकत्र किए जा रहे हैं और जैसे ही फाइनल फीगर आ जाएगी आपको विधानसभा वार आंकड़े दिए जाएंगे।




कैराना लोकसभा उपचुनाव

पांचों विधानसभाओं के आंकड़े


शामली
लोकदल 77159
भाजपा 77571
312 से भाजपा आगे रही

थाना भवन
लोकदल 88539
भाजपा 73334
लोकदल 15205 से आगे रही

कैराना
लोकदल 79378
भाजपा 93195
भाजपा 13817 से आगे रही


गंगोह (सहारनपुर)
लोकदल 108411
भाजपा 96141
लोकदल 12370 से आगे रही

नकुड़ (सहारनपुर) 
लोकदल 114341
भाजपा 86224
लोकदल 18117 से आगे रही 

उपरोक्त आंकड़े साफ कर रहे हैं कि थानाभवन व नकुड़ में भाजपा की करारी हार हुई। जबकि कैराना विधानसभा, जहां से तबस्सुम बेगम का बेटा नाहिद हसन सपा विधायक है, में रालोद की करारी हार हुई। यहां गुर्जर समाज ने मृगांका के लिए जमकर वोटिंग किया। शामली विधानसभा में भी भाजपा आगे रही। ऐस में सुरेश राणा व धर्म सिंह सैनी पर गाज भी गिर सकती है। 


Friday, 18 May 2018

कंवर हसन बने तबस्सुम के लिए बड़ा खतरा

कैरानाः लोकसभा उपचुनाव में जहां एक और विरासत के लिए हुकुम सिंह व मुनव्वर हसन का परिवार आमने सामने हैं। वहीं हसन परिवार की एकता भी दांव पर लगी है। कैराना के सपा विधायक नाहिद हसन के चाचा यानी संयुक्त प्रत्याशी तबस्सुम बेगम के देवर कंवर हसन ने भी लोकदल (सुनील सिंह) के प्रत्याशी के रूप में मैदान में हैं। कंवर हसन ने 2014 में भी चुनाव लड़ा था और उन्होंने बसपा के बैनर पर 160414 वोट पाए थे। सपा के टिकट पर लोकसभा का चुनाव लड़ रहे नाहिद हसन की हार में कंवर हसन के इन वोटों का भी बड़ा योगदान था। हुकुम सिंह जीत गए थे। अब फिर वहीं हालात बन रहे हैं। अगर कंवर हसन के वोट बढ़े तो तबस्सुम के लिए जीत कठिन होगी। भाजपा प्रत्याशी मृगांका सिंह हिंदू व पिछडी़ जाति के अलावा दलित वोटों में भी सेंध लगा सकती हैं। तबस्सुम को केवल 5 लाख मुस्लिम मतों पर ही भरोसा है। अगर कंवर हसन ने कुछ वोट काट दिए तो तबस्सुम दिक्कत में पड़ सकती हैं। नामांकन की प्रक्रिया की एक दिन पहले नाहिद हसन ने चाचा कंवर हसन से गुजारिश की थी कि वे मैदान से हट जाएं। अगर उन्होंने ऐसा किया तो वे (नाहिद) विधायक पद से इस्तीफा दे देंगे और उन्हें (कंवर हसन) विधानसभा चुनाव लड़वाने में सहयोग करेंगे। पर कंवर हसन नहीं माने (पढें संलग्न अमर उजाला अखबार की न्यूज) । कंवर हसन के मैदान में आने से भाजपा ने राहत की सांस ली है। कंवर हसन का कहना है कि जिस अजित सिंह के बैनर पर तबस्सुम बेगम चुनाव लड़ रही हैं। उसी के लोगों (जाटों ने) ने मुजफ्फरनगर दंगों के समय मुसलमानों की हत्याएं की थी। और वे उसी बैनर से चुनाव लड़ रही हैं ? अगर चुनाव के आगे बढ़ने तक कंवर हसन ने जोरदार प्रचार किया तो भाजपा की राह आसान हो सकती है।
देवर कंवर हसन से है तबस्सुम को खतरा। 



Saturday, 12 May 2018

Kairana ByPoll 2018 : घर का भेदी लंका ढाए, तबस्सुम परेशानी में

शामलीः कैराना लोकसभा के उपचुनाव में एक बार फिर हसन परिवार की घरेलू लड़ाई खुलकर सामने आ गई है। विपक्ष की इकलौती उम्मीदवार पूर्व सांसद तबस्सुम बेगम को परेशान करने के लिए उनके देवर कंवर हसन ने लोकदल (सुनील सिंह वाली) प्रत्याशी के रूप में दावा ठोक दिया है।

कंवर हसन के अलावा मुनव्वर के दूसरे भाई अनवर हसन (2012 में) और अरशद हसन (2007 में) भी विधानसभा चुनाव लड़ चुके हैं लेकिन उन्हें हार का सामना करना पड़ा। अब कंवर हसन आ गए हैं। कंवर हसन अब तक हसन परिवार का स्टील फैक्ट्री का कारोबार ही संभालते रहे हैं। पूर्व सांसद मुनव्वर हसन जब तक जिंदा थे तब तक पूरा हसन परिवार उनके कहे अनुसार चलता था लेकिन उनकी 2008 में असामयिक हादसे में मौत के बाद सारा परिवार बिखर गया। बाद में मुनव्वर हसन के पिता पूर्व सांसद अख्तर हसन भी वृद्धावस्था के चलते चल बसे। इस तरह हसन परिवार को जोड़कर रखने वाला कोई नहीं रहा। मायावती ने मुनव्वर की बेवा तबस्सुम को 2009 में लोकसभा का टिकट दे दिया और वे दिग्गज भाजपा नेता स्व. हुकुम सिंह (जो पहली बार लोकसभा चुनाव लडे थे) को हराकर सांसद बन गई। इसी के बाद से हसन परिवार में दो धड़े हो गए। मुनव्वर की पत्नी व बेटा नाहिद एक तरफ और उनके दूसरे भाई एक तरफ।
मृगांका पर बाबू हुकुम सिंह की विरासत बचाने का दबाव है। 
तबस्सुम ने पांच साल तक सांसद रहने के बाद अपनी राजनीतिक विरासत बेटे नाहिद हसन को सौंपने का फैसला किया। नाहिद उस समय आस्ट्रेलिया में पढ़ रहे थे और बहुत छोटे थे। नाहिद वापस लौटे और उन्होंने मां की बात मानकर कैराना सीट से ही सपा के टिकट पर 2014 का लोकसभा चुनाव लडा। मोदी लहर में हुकुम सिंह ने बड़ी जीत हासिल की। उन्हें 565909 वोट मिले और नाहिद को 329081 वोट मिले। नाहिद को जीत नहीं मिली लेकिन राजनीति की एबीसी सीख गए।

हुकुम सिंह के सांसद बन जाने के बाद कैराना विधानसभा सीट का अक्टूबर 2014 में उपचुनाव हुआ और इसमें नाहिद हसन हुकुम सिंह के भतीजे अनिल चौहान को हराकर विधायक बन गए। इससे मुनव्वर हसन के दूसरे भाइयों में बेचैनी बढ़ी और उन्होंने राजनीति में सक्रियता बढ़ाने का फैसला किया। परिवारों में आपसी झगड़े होते ही रहते हैं और इस परिवार में भी थे। इससे पहले 2012 में मुनव्वर के एक और भाई अनवर हसन (60750) ने भी बसपा के टिकट पर विधानसभा चुनाव लड़ा था और हुकुम सिंह (80293) से लगभग 20 हजार मतों से हारे थे। नाहिद उस समय विदेश में थे। मुनव्वर के भाइयों को लगा कि वे राजनीति में आगे आ सकते हैं। शायद यही वजह है कि अब कंवर हसन भी राजनीति में आए हैं।

कैराना लोकसभा उपचुनाव 2018 में भाजपा की प्रत्याशी स्व. हुकुम सिंह की बेटी मृगांका सिंह की जीत मुश्किल लग रही है। सारा विपक्ष एक हो गया है और पूर्व बसपा सांसद तबस्सुम को सपा, रालोद व कांग्रेस आदि का समर्थन मिल रहा है। ऐसे में उनकी जीत साफ नजर आ रही थी लेकिन एक और मुस्लिम प्रत्याशी मैदान में आता है तो खेल बिगड़ सकता है। लगभग 5 लाख मुस्लिम वोटरों वाले इस लोकसभा क्षेत्र में दो मुस्लिम प्रत्याशी तो होते ही थे। इससे भाजपा को भी राहत मिलेगी। सुनील सिंह की लोकदल की इस क्षेत्र में ज्यादा पहचान नहीं है लेकिन फिर भी ‘मनीगेम’ में वह हलचल कर सकते हैं। सुनील सिंह राजनीतिक परिवार से आते हैं और लखनऊ में उनके कई बड़े शैक्षणिक संस्थान हैं। कहा तो यह भी जा रहा है कि भाजपा ने कंवर हसन को अंदरूनी तौर पर सपोर्ट करने का फैसला किया है लेकिन ये सब राजनीति की बाते हैं।


 पिछले विधानसभा चुनाव में जब नाहिद हसन (98830) ने मृगांका (77668) को हराया था तो हुकुम सिंह के भतीजे अनिल (19992) ने रालोद के टिकट पर लड़कर ‘घर का भेदी लंका ढाए’ की भूमिका निभाई थी। अब यही काम कंवर हसन कर सकते हैं। वे जितने भी वोट काटेंगे सभी तबस्सुम के खाते से जाएंगे। देखते हैं 28 मई को चुनाव है और 31 को नतीजा आएगा। तब सब साफ हो जाएगा।

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Thursday, 10 May 2018

Kairana Bypoll : मृगांका व तबस्सुम ने भरे परचे

शामलीः कैराना में लोकसभा उपचुनाव के लिये भाजपा उम्मीदवार मृगांका सिंह ने वीरवार को अपना नामांकन भरा। मृगांका के पिता हुकुम सिंह के निधन के कारण यह सीट खाली हुयी है । नामांकन भरने की आज आखिरी तारीख थी। 28 मई को यहां चुनाव होने वाला हैं। विपक्ष को उम्मीद है कि इस उपचुनाव में भी हालिया गोरखपुर और फूलपुर उपचुनाव की जीत दोहरायी जाएगी  जिसमें सत्तारूढ़ भाजपा को जबरदस्त हार मिली थी।  राष्ट्रीय लोकदल की उम्मीदवार तबस्सुम बेगम ने कल अपना नामांकन भरा। समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी उनका समर्थन कर रही है। कांग्रेस ने भी कैराना में साझा उम्मीदवार के समर्थन के संकेत दिये हैं।




Tuesday, 8 May 2018

Kairana Bypoll : भाजपा ने मृगांका पर ही खेला दांव

नई दिल्लीः यूपी की प्रतिष्ठित कैराना लोकसभा सीट के उपचुनाव के लिए भाजपा ने मृगांका सिंह को ही अपनी प्रत्याशी बनाया है। हुकुम सिंह के निधन के बाद खाली हुई इस सीट पर उपचुनाव हो रहा है और मृगांका उनकी बेटी हैं। मृगांका ने 2014 में कैराना विधानसभा सीट से भी किस्मत आजमाई थी लेकिन सपा के नाहिद हसन से हार गई थी। उस समय हुकुम सिंह जीवित थे और उन्होंने अपने जीते जी बेटी को राजनीति में स्थापित करने की कोशिश की थी लेकिन उनका सपना पूरा नहीं हो सका। उनके भतीजे अनिल ने रालोद प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़ा था और इतनी वोट काट दी थी कि मृगांका चुनाव हार सकें। वही हुआ था। हुकुम सिंह की तीन बेटियां हैं, दो विदेश में रहती हैं और मृगांका गाजियाबाद में। मृगांका सिंह स्कूल चलाती हैं और हुकुम सिंह की विरासत की कमान कायदे से उन्हीं के हाथ में है। मृगांका का मुकाबला सपा, बसपा व रालोद की संयुक्त प्रत्याशी बेगम तबस्सुम हसन से हो रहा है जो कैराना से 2009 में सांसद रह चुकी हैं। ये मुकाबला इस समय देश में कर्नाटक विस चुनाव के बाद सबसे बड़ी राजनीतिक लड़ाई बन गया है। योगी सरकार इसे हर हालत में जीतना चाहेगी क्योंकि 2019 के आम चुनाव से पहले यह भाजपा के लिए बहुत ही अहम मुकाबला है। योगी भी गोरखपुर व फूलपुर की हार का हिसाब चुकाना चाहेंगे। 

Saturday, 28 April 2018

कैराना लोकसभा उपचुनाव- मृगांका ही संभालेंगी हुकुम सिंह की विरासत, 10 प्रमुख चुनौतियां

नई दिल्लीः कैराना लोकसभा चुनाव के लिए तारीख का ऐलान हो चुका है। 28 मई को मतदान होगा और 31 को नतीजा आएगा। वेस्ट यूपी के शामली और सहारनपुर की पांच विधानसभाओं को मिलाकर बनने वाली यह लोकसभा सीट भाजपा के वरिष्ठ गुर्जर नेता बाबू हुकुम सिंह का फरवरी में निधन में हो जाने के कारण खाली हुई है। 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले यह यूपी में भाजपा के लिए नेट प्रैक्टिस का मौका है। फूलपुर व गोरखपुर की लोकसभा सीटों को समाजवादी पार्टी से हार जाने के बाद से ही भाजपा और यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ पर भारी दबाव है कैराना में अपना दम दिखाने का। हालांकि अभी किसी भी पार्टी ने अपना प्रत्याशी घोषित नहीं किया है लेकिन यह तय माना जा रहा है कि भाजपा यहां से हुकुम सिंह की बेटी मृगांका सिंह को ही उतारेगी। और यह भी तय है कि अगर मृगांका को टिकट नहीं मिला तो भाजपा के लिए यहां इज्जत बचाना संभव नहीं होगा। आइये जानते हैं भाजपा के सामने इस सीट को कड़ी चुनौती बनाने वाले 10 खास समीकरण–


1. जातीय आंकड़ा- इस सीट पर जातीय समीकरण बहुत ही कठिन हैं। ये कतई भी भाजपा के पक्ष में नहीं जाते। इस सीट पर हिंदु गुर्जर, मुस्लिम गुर्जर, दलित व ओबीसी मतों को बड़ा पेचिदा सा आंकड़ा है। यहां 5 लाख के करीब मुस्लिम वोटर हैं और तीन लाख के करीब दलित वोटर। आप समझ सकते हैं कि भाजपा के लिए कितना मुश्कि है। यही वजह है कि कैराना लोकसभा सीट के इतिहास में भाजपा केवल दो बार ही यह सीट जीत पाई है। एक बार 1998 (वीरेंद्र वर्मा) और दूसरी बार 2014 (हुकुम सिंह) में।
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2. विपक्ष की एकता- यह तो तय है कि यहां भी विपक्षी एकता का बड़ा अहम रोल रहेगा परिणाम में। अगर यहां भाजपा की सीधी टक्कर किसी एक दमदार प्रत्याशी से होती है तो उसे जीतने के लिए एडी चोटी का जोर लगाना होगा। अगर मुकाबला तिकोना हुआ तो भाजपा के चांस बन सकते हैं। सपा-बसपा के तो एक साथ जाने के पूरे चांस हैं लेकिन कांग्रेस व रालोद का भी उन्हें साथ मिलेगा या नहीं यह बड़ा सवाल है। कांग्रेस ने सपा-बसपा का साथ फूलपुर व गोरखपुर में भी नहीं दिया था।

3. मुस्लिम वोटर निर्णायक- कैराना लोकसभा सीट में शामली जिले की थानाभवन, कैराना व शामली और सहारनपुर जिले की नकुड़ व गंगोह विधानसभा सीटें आती हैं। इनमें से शामली को छोड़कर सभी पर मुस्लिम वोटर बड़ी संख्या में हैं। यहां से 6 बार मुस्लिम सांसद चुने जा चुके हैं। हुकुम सिंह से पहले बसपा से तबस्सुम बेगम सांसद थीं। वे अपने पति मुनव्वर हसन (सपा सांसद) की मौत के बाद सहानुभूति लहर में सांसद बनी थीं 2009 में। गंगोह व नकुड़ सीटों पर भी मुस्लिम वोटरों का बोलबाला है।
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4. दलित वोटरों के तेवर - 2014 के चुनाव के समय कैराना सीट पर दलित वोटरों ने खुलकर भाजपा के लिए मतदान किया था। मुजफ्फरनगर दंगे के बाद बने माहौल में दलित वोटरों ने खुद सवर्ण-ओबीसी वोटरों के साथ मिलकर सपा व बसपा के खिलाफ मतदान किया था। इसलिए सपा के प्रत्याशी नाहिद हसन (अब कैराना विधायक) क 329081 वोट मिले थे और बसपा प्रत्याशी कंवर हसन (नाहिद के चाचा) को 160414 ही वोट मिले थे। दोनों मिलाकर भी हुकुम सिंह (565909) के बराबर नहीं पहुंच पाए थे। साफ था मतों का ध्रुवीकरण भाजपा के समर्थन में था। दलित वोटरों का मूड 2 अप्रैल को हुए भारत बंद के मामले से बिगड़ा हुआ है। पुलिस ने जिस तरह से दलित युवकों को पकड़ पकड़कर अंदर किया या पिटाई की उसके बाद से रविदासी समाज में भारी आक्रोश है भाजपा के खिलाफ।

5. जाट मतदाता अनिश्चित- इस लोकसभा सीट पर लगभग सवा लाख जाट वोटर भी हैं। ये ज्यादातर शामली, कैराना व थानाभवन विधानसभा क्षेत्रों में हैं। वैसे जाट मतदाता अजित सिंह के साथ जुड़े रहे हैं लेकिन मुजफ्फरनगर दंगे के समय से जाट वोटर भी अजित सिंह से छिटक गए और इन्होंने भारी संख्या में भाजपा को वोट किया था। यही वजह थी कि रालोद के कांग्रेस समर्थित प्रत्याशी करतार सिंह भड़ाना को 42706 वोट ही मिल पाए थे। यदि रालोद भी विपक्ष के महागठबंधन का हिस्सा बनता है तो जाट वोटर भाजपा से अलग हो सकते हैं।

6. अन्य जातियों का रुझान- कैराना लोकसभा सीट पर 1.25 लाख गुर्जर, 1.2 लाख कश्यप, 1.10 लाख सैनी. 50 हजार ब्राह्मण, 55 हजार ठाकुर, 55 हजार वैश्य मतदाता भी हैं। इसके अलावा लगभग 2 लाख वोटर अन्य जातियों के हैं। ये सब बिरादरियां अगर भाजपा के साथ जाती हैं तो उसे फायदा होगा। लेकिन यदि मुकाबले में केवल एक ही मुस्लिम प्रत्याशी हो तो भाजपा के लिए यह सीट टेढ़ी खीर बन जाती है।

7. सहारनपुर का मसूद फैक्टर- सहारनपुर के बाहुबली नेता इमरान मसूद भी इस सीट को लेकर बहुत बड़ा फैक्टर न रहे हैं। कांग्रेस के प्रदेश उपाध्यक्ष इमरान मसूद सहारनपुर की राजनीति में बड़ा नाम हैं। 2014 के चुनाव से पहले मोदी के बारे में दिया गया उनका बयान सोशल मीडिया पर सुर्खियों में आया था और वे विवादों में हमेशा ही घिरे रहते हैं। इसके बावजूद कांग्रेस ने वेस्ट की राजनीति में उन्हें बड़ा मुस्लिम नाम मानते हुए प्रदेश उपाध्यक्ष बनाया था। इमरान नकुड़ व गंगोह विस सीटों पर मुस्लिम वोटर का मूड सेट कर सकते हैं। बताया जाता है कि वे पार्टी हाईकमान को अपने इरादे बता चुके हैं और उनकी राय में कांग्रेस को सपा व बसपा प्रत्याशी को समर्थन नहीं देना चाहिए। उन्होंने राहुल गांधी के सामने राय रखी है कि अगर वे चौधरी अजित सिंह या उनके बेटे जयंत चौधरी को समर्थन देकर लड़ाएं तो यह सीट जीती जा सकती है। मुस्लिम व जाट मतों का एक साथ आना हमेशा से राष्ट्रीय लोकदल के फायदे में रहा है।

8. विपक्ष का प्रत्याशी कौन- इस सीट पर यह बड़ा सवाल है। भाजपा के खिलाफ सपा व बसपा एक तो हो सकते हैं लेकिन यहां प्रत्याशियों का घोर अभाव है। कोई दमदार नाम नहीं नजर आता। सपा पूर्व मंत्री वीरेंद्र सिंह गुर्जर को उतारकर मुस्लिम-गुर्जर मतों को जुटा सकती है लेकिन बाकी जातियों के भी वोट उन्हें मिलेंगे या नहीं यह नहीं कहा जा सकता। कैराना से हमेशा ही हुकुम सिंह को टक्कर देने वाला हसन परिवार भी चुनावी अखाड़े में सदैव उतरता रहता है लेकिन वहां से भी कोई मजबूत नाम नहीं नजर आ रहा है। नाहिद हसन विधायक बन चुके हैं। उनकी मां व पूर्व सांसद तबस्सुम हसन ने विरासत बेटे को सौंप दी है। पहले भी चुनाव लड़ चुके नाहिद के चाचा कंवर व अरशद हसन का राजनीतिक वजूद कुछ नहीं है। इसके अलावा थानाभवन से चुनाव लड़ चुके डॉ. सुधीर पंवार का नाम भी सुनने में आ रहा है। इसके अलावा कुछ माह पहले सपा छोड़कर रालोद में गए अमीर आलम खां के नाम की भी चर्चा है। आलम 1999 में रालोद के टिकट पर यहां से सांसद भी रह चुके हैं। उनका गांव गढ़ीपुख्ता भी इसी लोकसभा सीट का हिस्सा है। बहरहाल आलम चूंकि रालोद में हैं उनकी स्थिति साफ नहीं है। अगर अजित सिंह किसी भी तरह सपा व बसपा से मिलकर आलम या उनके बेटे नवाजिश आलम (बुढ़ाना के पूर्व सपा विधायक) के नाम पर सहमति बना लें तो सीट निकाली जा सकती है। कुल मिलाकर अगर भाजपा यहां फिर से जीतती है तो इसमें सबसे बड़ा रोल विपक्ष के प्रत्याशी को चयन का होगा।

9. भाजपा के चांस- भाजपा लगातार दूसरी बार यह सीट जीतने की कोशिश करेगी और उसके पक्ष में सबसे बड़ी बात यही है कि उनके पास बाबू हुकुम सिंह के निधन की सहानुभूति लहर होगी। कैराना में पहले भी तबस्सुम बेगम (मुनव्वर हसन की बेवा) को सहानुभूति लहर में एक महिला प्रत्याशी को जीत मिल चुकी है। वैसे सुनने में आया है कि कैराना से 2004 में सांसद रह चुकी अनुराधा चौधरी के नाम पर भी कुछ भाजपाई दांव लगा रहे हैं लेकिन फिलहाल पार्टी में संदेश यही है कि अगर यह सीट जीती जा सकती है तो केवल हुकुम सिहं की बेटी मृगांका सिंह के नाम पर ही जीती जा सकती है। इस पर मोदी, अमित शाह व राजनाथ सिंह आदि नेता भी सहमत बताए जाते हैं।

10. खामोश मतदाता- ऐसा नहीं है कि यदि बसपा व सपा मिलकर चुनाव लड़ते हैं तो यह सीट हलुवा होगी। माना कि मुस्लिम व दलित वोटर एक जगह हो जाएंगे तो संयुक्त प्रत्याशी को जीत मिल ही जाएगी। ओबीसी व सवर्ण जातियों के वोट भी मिलकर एक बड़ा समीकरण बन जाते हैं। ये चाहें तो किसी भी चुनाव को रुख मोड़ सकते हैं लेकिन यहां सबसे बड़ा फैक्टर मतदान प्रतिशत का रहेगा। अगर यहां मतदान प्रतिशत 60 प्रतिशत से ऊपर जाता है तो भाजपा का पलड़ा भारी रहेगा। भाजपा के लिए सबसे बड़ी चुनौती मई की तपती दुपहरी में अपने वोटर को मतदान केंद्र तक पहुंचाना होगा। अगर वह यह कर पाने में सफल रहती है तो उसकी जीत तय है। फूलपुर व गोरखपुर में मतदान प्रतिशत कम रहने की वजह से ही भाजपा को हार का मुंह देखना पड़ा था।